सुरासम्पूर्ण कलशं रुधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥
#नवरात्रि के चौथे दिन दुर्गा जी के चतुर्थ स्वरूप माँ कूष्मांडा की पूजा की जाती है। मान्यता है कि जब सृष्टि में केवल अंधकार था, तब इन्होंने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी। वे सूर्यलोक के भीतर निवास करती हैं और उनका तेज असीम है।
सिंह पर सवार देवी का यह स्वरूप हमें विपरीत परिस्थितियों में भी मुस्कुराते रहने और निर्भय जीने का संदेश देता है।
माँ कूष्मांडा की सच्चे मन से की गई साधना हर तरह के रोग, शोक और दुखों का नाश करती है। माता अपने हर भक्त को दीर्घायु, यश, बल और उत्तम स्वास्थ्य का वरदान देती हैं।
सृष्टि की रचयिता हम सभी के अंतःकरण में ज्ञान और आरोग्यता का प्रकाश भरें।
ॐ देवी कूष्माण्डायै नमः 🙏🚩
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